इस दुनिया में कौन कहता है की गम से बेगाना हूँ मैं
देता हूँ किसी के होटों पे मुस्कराहट तो क्या बुरा है गर दीवाना हूँ मैं
औ मंजिलें ढूंढ सकता हूँ दूसरों की आखिर
औ मंजिलें ढूंढ सकता हूँ दूसरों की आखिर
क्या हुआ जो अपने ही शहर की गलियों से अनजाना हूँ मैं
औ दोस्ती, प्यार, वफ़ा सब कोरी बातें लगती हैं
दोस्ती, प्यार, वफ़ा सब कोरी बातें लगती हैं
जब पाता हूँ की कुछ नहीं हूँ
बस उसकी बेवाफईओं का इक अफसाना हूँ मैं
कि जिसको दिल दिया था कभी ये सोच कर
गर साज़ हो तुम तो तराना हूँ मैं
औ मत आओ करीब मेरे कि अब कुछ ना मिलेगा
कुछ नहीं हूँ बस किसी महफ़िल का वीराना हूँ मैं
औ बस इतनी मेरी कहानी, इतना मेरा मुक्क़दर
औ बस इतनी मेरी कहानी, इतना मेरा मुक्क़दर
कि मय नहीं बाकी, मगर मयखाना हूँ मैं
कि किसी कि चाहतों का उजड़ा हुआ इक आशियाना हूँ मैं
फिर भी देता हूँ किसी के होटों पे मुस्कराहट तो क्या बुरा है गर दीवाना हूँ मैं
Sunday, December 20, 2009
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ye poem to mujhe yaad hai ki tune college mein likha tha..
ReplyDeleteOne of your bests!!!
:)